नागौर दुर्ग से सम्बन्धित रोचक तथ्य !! Nagour fort

मारवाड़ के स्थल दुर्गों में नागौर दुर्ग बड़ा महत्वपूर्ण है। मारवाड़ के अन्य विशाल दुर्ग प्राय: पहाड़ी ऊँचाईयों पर स्थित है। भूमि पर निर्मित दूसरा ऐसा कोई दुर्ग नहीं है जो दृढ़ता में नागौर का मुकाबला कर सके। केन्द्रीय स्थान पर स्थित होने के कारण इस दुर्ग पर निरंतर हमले होते रहे। अत: इसकी रक्षा व्यवस्था भी समय-समय पर दृढ़तर की जाती रही।

नागौर का प्राचीन नाम अहिछत्रपुर बताया जाता है जिसे जांगल जनपद की राजधानी माना जाता था। यहां नागवंशीय क्षत्रियों ने करीब दो हजार वर्षों तक शासन किया। उन्हें आगे चलकर परमारों ने निकाल दिया।
पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर के एक सामंत ने वि०सं० १२११ की वैशाख सुदी २ को नागौर दुर्ग की नींव रखी। राजस्थान के अन्य दुर्गों की तरह इसे पहाड़ी पर नही, साधारण ऊँचाई के स्थल भाग पर बनाया गया। इसके निर्माण की एक विशेषता है कि बाहर से छोड़ा हुआ तोप का गोला प्राचीर को पार कर किले के महल को कोई नुकसान नही पहुँचा सकता यद्यपि महल प्राचीर से ऊपर उठे हुए हैं।

नागौर का मुख्य द्वार बड़ा भव्य है। इस द्वार पर विशाल लोहे के सीखचों वाले फाटक लगे हुए हैं। दरवाजे के दोनों ओर विशाल बुर्ज और धनुषाकार शीर्ष भाग पर तीन द्वारों वाले झरोखे बने हुए हैं। यहां से आगे किले का दूसरा विशाल दरवाजा है। उसके बाद ६० डिग्री का कोण बनाता तीसरा विशाल दरवाजा है। इन दोनों दरवाजों के बीच का भाग धूधस कहलाता है। नागौर दुर्ग का धूधस वस्तु निर्माण का उत्कृष्ट नमूना है। प्रथम प्राचीर पंक्ति किले के प्रथम द्वार से ही दोनों ओर घूम जाती है। अत्याधिक मोटी और ऊँची इस ५००० फुट लंबी दीवार में २८ विशाल बुर्ज बने हुए हैं। किले का परकोटा दुहरा बना है। एक गहरी जलपूर्ण खाई प्रथम प्राचीर के चारों ओर बनी हुई थी। महाराजा कुंभा ने एक बार इस खाई को पाट दिया था, पर इसे पुन: ठीक करवा दिया गया। प्राचीरों के चारों कोनों पर बनी बुजाç की ऊँचाई १५० फुट के लगभग है। तीसरे परकोटे को पार करने पर किले का अन्त: भाग आ जाता है। किले के ६ दरवाजे है जो सिराई पोल, बिचली पोल, कचहरी पोल, सूरज पोल, धूषी पोल एंव राज पोल के नाम से जाने जाते हैं। किले के दक्षिण भाग में एक मस्जिद है। इस मस्जिद पर एक शिलालेख उत्कीर्ण है। इस मस्जिद को शाँहजहां ने बनवाया था।
केन्द्रीय स्थल पर होने के कारण इस दुर्ग को बार-बार मुगलों के आक्रमण का शिकार होना पड़ा। सन् १३९९ ई० में मण्डोर के राव चूंड़ा ने इस पर अधिकार कर लिया। महाराणा कुंभा ने भी दो बार नागौर पर बड़े जबरदस्त आक्रमण किए थे। कुम्भा के आक्रमण सफल रहे एंव इस दुर्ग पर इनका अधिकार हो गया। मारवाड़ के शासक बख्तसिंह के समय इस दुर्ग का पुननिर्माण करवाया गया। उन्होंने किले की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया। मराठों ने भी इसी दुर्ग पर कई आक्रमण किए। महाराणा विजयसिंह को मराठों के हमले से बचने के लिए कई माह तक दुर्ग में रहना पड़ा था।

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